एक नज़्म :: सिग्रेट और ज़िन्दगी | Nazm :: Cigarette aur Zindagi


 

सिग्रेट नहीं छूटेगी मुझ से,
बिल्कुल तुम्हारी ही मानिंद ज़िन्दगी -
कुछ ऐसा ही मानना था मेरा...
इक दिन तक गुज़रता नहीं था
उसके बिना मेरा।

अब, कभी शौक़ से पी लेता हूँ सिग्रेट
हफ़्तों में या महीनों में एक-दो बार।
जो आदत थी, वो तो छूट चुकी कब से।

ज़िन्दगी मुझे तेरा तो कोई शौक़ भी नहीं।
सिग्रेट भी छूट जाती है यहाँ;
और तू तो ज़िन्दगी,
सिग्रेट जितनी पसंद थी ही नहीं मुझे कभी भी।

  ©  अर्पण क्रिस्टी
© Arpan Christy

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