नज़्म :: कुछ तो कहा होगा तुमने | Nazm :: Kuch to kaha hoga tumne

नज़्म :: कुछ तो कहा होगा तुमने

आदत थी ही नहीं मुझे
जैकेट्स या स्वेटर्स पहनने की
जाड़े में।
तुम्हारा बदन भी तो
पहना नहीं मैंने कभी,
वैसे ही।

तुम्हारी आवाज़,
तुम्हारी शफ़क़त की
इक शॉल हुआ करती थी हालाँकि,
जिसे मैं लपेट लेता था।
काफ़ी थी वो,
मुझे गरमाहट देने के वास्ते।

जानते थे तुम कि
तुम्हारे साथ ही
वो शॉल भी
दूर हो जायेगी मुझसे।
दूर रह कर भी ख़याल मेरा
बख़ूबी रखते हो तुम।

कुछ तो कहा होगा तुमने उसे
कि अब जाड़ा,
पहले सा सर्द
रहता नहीं।

© अर्पण क्रिस्टी

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