Poem : Jaante the....

जानते थे.....
जानते थे की टूटने ही वाले हैं
वह वादे लेकिन,

रोज़ ही ना जाने कितने वादे किये,
खुद का वास्ता दिया तो कभी ज़िन्दगी का,
कि बिछड़ेंगे नहीं कभी...

अच्छा लगता है झूठा बहेलावा दिल को,

पानी को भिगोने कि बात थी वह,
एक दूसरे के वजूद पर
अपनी उँगलियों से
एक दूसरे का नाम लिख देने की…
जैसे घर के बाहर अपने नाम की
तख्ती लगा लेते है लोग.

तो फिर क्यूँ आज
तुम्हारा दिल छत पर अकेला जा खड़ा है,
तुम जब तनहा  होती, तब जाया करती थी वैसे?
मैंने तो, वह जो कोने के रूम में
अकेला जा बैठा है अँधेरे में,
उस दिल को वापस बुलाने को
आवाज़ दे दी है.
अब तुम भी बुला लो उसे नीचे वापस.

कुछ नाम,
लिखने के बावजूद भी अनलिखे ही रहते हैं...

पर क्या करें?
बावरे होते है दिल बहुत.

वरना अंजाम के बारे में तो वह
भी जानते थे....

-अर्पण

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